चेंबूर-माहुल समुद्री किनारे स्थित भूमि पर अनधिकृत निर्माण और पर्यावनीय उल्लंघन पर सख्त रुख, जनप्रतिनिधियों और पुलिस की चुप्पी पर उठाए सवाल…..?
मुंबई, 11 अक्टूबर:
मुंबई दक्षिण-मध्य लोकसभा क्षेत्र तथा इसके अंतर्गत आने वाले चेंबूर और अणुशक्तिनगर विधानसभा क्षेत्रों के वर्तमान और पूर्व सांसदों, विधायकों एवं नगरसेवकों की चुप्पी से नाराज़ सामाजिक संस्थाओं (NGO) के एक समूह ने समुद्री क्षेत्र में हो रहे कथित पर्यावरणीय उल्लंघनों और अनधिकृत गतिविधियों को लेकर गंभीर चिंता जताई है।
कथित अनियमित लीज़ और पर्यावरणीय
उल्लंघन …..!!!!!
प्राप्त जानकारी के अनुसार, चेंबूर के माहुल स्थित गवाण गाँव में मुंबई पोर्ट ट्रस्ट (MbPT) के कब्जे वाली 11,904 वर्ग मीटर समुद्री भूमि को सितंबर 2023 में एजिस लॉजिस्टिक्स लिमिटेड को पेट्रोलियम स्टोरेज टर्मिनल के लिए मात्र ₹1 प्रतिवर्ष की लीज़ पर, सीमित निविदा प्रक्रिया द्वारा, 30 वर्षों के लिए आवंटित किया गया। यह अनुबंध 18 जनवरी 2024 को LOA (लेटर ऑफ अवार्ड) जारी कर जुलाई 2024 तक अंतिम रूप से प्रदान किया गया, जिसमें प्रति वर्ग मीटर ₹34,000 अग्रिम राशि तय की गई थी।
पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी के आरोप….!!!!!
यह भूमि तटीय नियमन क्षेत्र (CRZ) के अंतर्गत आती है और विकास योजना (DP) के अनुसार NDZ (नो-डेवलपमेंट ज़ोन) में स्थित है। यह मैंग्रोव और आरक्षित वन क्षेत्रों से भी घिरी हुई है। ऐसे में किसी भी प्रकार के पेट्रोलियम निर्माण कार्य से पहले Environment Clearance — CRZ Clearance, तथा BMC, MPCB, PESO, MOEFCC, MCZMA जैसे विभाग प्राधिकरणों से मंजूरी लेना अनिवार्य होता है।
NGO समूह का आरोप है कि 1 जनवरी 2024 से 31 जुलाई 2024 के बीच बिना अनुमति के 662 वर्ग मीटर क्षेत्र में समुद्र की दक्षिण दिशा की ओर लाखों मीट्रिक टन मिट्टी भरकर भूमि विस्तार किया गया। साथ ही अगस्त 2024 से दिसंबर 2024 के बीच लगभग 2,500 वर्ग मीटर क्षेत्र में समुद्र के भीतर भी भराई की गई। इस अवैध कार्य में कंपनी, स्थानीय ठेकेदारों और कथित “मिट्टी माफिया” की संलिप्तता पर भी जनता द्वारा गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
भूमि स्वामित्व को लेकर विवाद…!!!!
NGO के अनुसार, यह भूमि वास्तव में मुंबई पोर्ट ट्रस्ट की नहीं, बल्कि महाराष्ट महसूल कायदा 1966 की धारा 294 और 295 के अनुसार महाराष्ट्र राज्य सरकार की है। 9 अक्टूबर को हुई संयुक्त जांच में NGO समूह ने तहसीलदार महोदय को इस संबंध में साक्ष्य व दस्तावेज़ सौंपे, जिससे भूमि स्वामित्व को लेकर विवाद और गहरा हो गया है।
NGO समूह के कही सदस्यों ने महाराष्ट महसूल कायदा 1966 कलम 50 और 54 के अंतर्गत कार्यवाही की मांग पर अड़े है और MPDA अंतर्गत FIR दर्ज का अनुग्रह तहसीलदार महोदय से कर रहे हैं !
राजनीतिक चुप्पी पर सवाल….!!!!
चेंबूर की जनता और NGO समूह ने विधायक तुकाराम काते, अणुशक्तिनगर की विधायक सना मलिक शेख, दक्षिण-मध्य मुंबई के सांसद अनिल देसाई, पूर्व सांसद राहुल शिवाले और राज्यसभा सांसद चंद्रकांत हंडोरे की चुप्पी पर नाराज़गी जताई है।
हालाँकि, विधायक सना मलिक शेख ने महाराष्ट्र विधानसभा में यह मुद्दा उठाया था और कार्रवाई की माँग की थी, जिस पर उपसभापति अन्ना बनसोडे ने एक महीने के भीतर लाखों टन मिट्टी हटाने और पर्यावरण की बहाली का आदेश दिया था। लेकिन 9 अक्टूबर की संयुक्त जांच में NGO ने पाया कि आदेश के 15 दिन बीत जाने के बावजूद भी घटनास्थल से एक किलो मिट्टी भी नहीं हटाई गई है।
पुलिस की निष्क्रियता पर भी सवाल….!!!!
पोलीस उपायुक्त (परिमंडल 6) समीर शेख जैसे ईमानदार और अनुशासित अधिकारी की नियुक्ति के बावजूद, RCF पुलिस थाने में पिछले 14 महीनों से जारी इस प्रकार की अनधिकृत गतिविधियों के मामले में न तो अब तक कोई FIR दर्ज की गई है, और न ही कोई जाँच या दोषियों पर कार्रवाई की गई है। इससे RCF पुलिस, वनपरिक्षेत्र सह प्रदूषण नियंत्रण मंडल के अधिकारी की भूमिका और कर्तव्य पर जनता में गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
स्थानीय नगरसेवकों की चुप्पी…!!!!
चेंबूर और अणुशक्तिनगर क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाले BMC के दो दर्जन से अधिक नगरसेवकों और नगरसेविकाओं की चुप्पी को लेकर भी जनता में आक्रोश है। NGO समूह का मानना है कि आगामी महानगर पालिका चुनावों में मतदाता इस मुद्दे को गंभीरता से लेंगे, जो जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही का एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।
उपमुख्यमंत्री को दी गई शिकायत…!!!!
सूत्रों के अनुसार, राज्य के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के हालिया चेंबूर दौरे के दौरान चेंबूर विधानसभा प्रमुख संजय राठौड़ ने इस पर्यावरणीय उल्लंघन तथा अवैध गतिविधियां की शिकायत कर तत्काल कड़ी कार्रवाई की माँग की है।
दशहरा संदेश की विडंबना…!!!
NGO समूह ने दशहरा पर्व का हवाला देते हुए कहा कि जैसे श्रीराम ने रावण का वध कर अधर्म का अंत किया था, ठीक उसी प्रकार अब जनता यह सोचने पर मजबूर है कि क्या एक साधारण NGO समूह इस विशाल “अनधिकृत परियोजना” धनवान रूपी रावण का अंत कर सकेगा….?
क्या चेंबूर और मुंबई में कानून, संविधान और शासन का राज बना रहेगा, या आम नागरिकों का कानून व्यवस्था से विश्वास उठता चला जाएगा…?
अब देखने वाली बात यह है कि संबंधित विभाग, प्राधिकरण, पुलिस और जनप्रतिनिधि इस गंभीर मामले पर कोई ठोस और शीघ्र कार्रवाई करते हैं या यह भी केवल सरकारी फाइलों और राजनीतिक बयानों तक ही सीमित रह जाएगा.
संक्षेप में:
यह मामला सिर्फ एक निर्माण परियोजना का नहीं, बल्कि पर्यावरण, जनहित और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन चुका है। अब यह देखना बाकी है कि क्या कानून और जनसंवेदनशीलता की जीत होती है या फिर यह मुद्दा भी अन्य मामलों की तरह अनदेखा रह जाएगा।
